भारतीय मीडिया और उससे जुड़े तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग नीचता की पराकाष्ठा पर उतर आए
हैं । लाशों के ढेर और लोगों की पीड़ाएँ जहां एक सामान्य व्यक्ति को दुःख की सिहरन
से जकड़ लेती है वहीं दूसरी ओर यही क्रंदन इन भांडों के लिए स्वास्थ्यवर्धक हास्य
गैस की भांति है इन्हें पोषित करती है । भारत वास्तव में एक विकट परिस्थिति से गुजर
रहा है यह यकीनन भयावह है परंतु इन संकट की घड़ी में भी केवल अपने निजी हित साधे
जाने चाहिए । यह सोचने योग्य विषय है । भारत में आज दिनांक 30/04/2021 तक कुल
मृत्यु लगभग 2 लाख है । भारत एक विशाल देश है जिसकी कुल जनसंख्या लगभग 130 करोड़ है
। भारत मे प्रति लाख जनसंख्या पर मृत्यु दर विश्व की औसत की मात्रा एक तिहाई है ।
जबकि विश्व के सभी देशों में इससे भी अधिक मौतें पहले दौर में ही हो चुकी है जिनकी
जनसंख्या की भारत से बहुत कम है । कुछ अधम पत्रकार भारत के संकट की इस घड़ी में भी
अपना एजेंडा चला रहे हैं विदेशों में भारत के विरुद्ध लेख लिखे जा रहे हैं ताकि
भारत की वैश्विक छवि को धूमिल किया जा सके । इसके लिए वो जलते हुए शमशानों की
तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मंच पर परोस कर लाहों से अपने एजेंडे को पोषण दे रहे हैं ।
इसलिए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के लिए उन्हें बड़े बड़े आंकड़े चाहिए
मौत के आंकड़े । आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है लाशों के ढेर पर बैठकर राजनीति,
पत्रकारिता और और विद्वता चमकाने का प्रयोग 2002 हिन्दू विरोधी दंगों में कर चुके
हैं इसलिए यह कोई नई बात नहीं है । भारत को लाशों के ढेर दिखाने के लिए लाशें भी तो
चाहिए तो यह काम दिल्ली(शहरी माओवादी, कांग्रेस का पूर्व NSA सदस्य), महाराष्ट्र के
जिम्मे हैं जो अकेले ही 15500 और 68000 के साथ लगभग 40% योगदान दे रहे हैं । जो लोग
आंकड़े दिखा दिखा कर लोगों को डरा रहे हैं वो लोग बड़ी ही बेशर्मी से केजरीवाल और
उद्धव ठाकरे को सबसे सफल मुख्यमंत्री बता रहे हैं । सबसे अच्छी व्यवस्था के उपरांत
भी उत्तरप्रदेश पर तरह तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं परंतु इतनी हिम्मत कहाँ की अपने
मालिक केजरीवाल और उद्धव ठाकरे से सवाल पूछ सके । क्यों एक भर भर के विज्ञापन देता
है दूसरा भर भर के धमकी ।
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